हूं अचल मैं या विचल,

किंचित न मुझको ज्ञान जल!

शक्ति हुई अब क्षीण क्या,

स्तिथि यद्यपि गंभीर या।।

मुझमें न अब ज्ञान शेष,

ना रह गया अब मैं विशेष।

इच्छाएं होती अब समाप्त,

यद्यपि अभी कुछ न प्राप्त।।

सागर हूं या सिर्फ प्रपात,

गिरता निरंतर है ये गात।

मन में संशय बचा मात्र,

होगा क्या कल चिर प्रभात।।

संघर्ष कर या कर्म कर,

तू रोज़ उठ और रोज मर।

होगा प्रभात एक उषा को,

हो जशन उस निशा को….